टोनही प्रताड़ना और हत्या के दोषी को आजीवन कारावास, विशेष न्यायालय बैकुंठपुर का अहम फैसला

जिला कोरिया। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के विशेष न्यायालय, बैकुंठपुर के विशेष न्यायाधीश श्री आशीष पाठक ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए हत्या एवं टोनही प्रताड़ना के मामले में आरपी उमेश कुमार केंवट को दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। न्यायालय ने आरोपी पर अर्थदंड भी अधिरोपित किया है।

प्रकरण के अनुसार 15 सितंबर 2022 की शाम लगभग 5:30 बजे मृतिका मृतिका कोलसिया उर्फ कौशल्या पण्डो तालाब से नहाकर वापस घर लौट रही थी। इसी दौरान रास्ते में आरोपी उमेश कुमार केंवट ने उस पर पीछे से धारदार हथियार (जरकट्टी) से ताबड़तोड़ हमला कर दिया। गंभीर चोट लगने से मृतिका गिर पड़ी और उसकी मौके पर ही मृत्यु हो गई।

घटना की सूचना मिलने पर थाना पोंड़ी पुलिस ने जांच कर अपराध क्रमांक 144/2022 के तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 302, छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम की धारा 4 एवं 5 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की धारा 3(2)(v) के अंतर्गत मामला दर्ज किया था।

सुनवाई के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों एवं गवाहों के आधार पर न्यायालय ने आरोपी को दोषी पाते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास एवं 100 रुपये अर्थदंड, टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम की धारा 4 के तहत एक वर्ष का कारावास, तथा धारा 5 के तहत दो वर्ष का कारावास एवं अर्थदंड की सजा सुनाई।

समाज में बढ़ते अत्याचारों पर विशेष टिप्पणी

प्रकरण में शासन की ओर से पैरवी करते हुए विशेष लोक अभियोजक महेश कुमार शर्मा ने न्यायालय के समक्ष तर्क रखा कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के लोगों पर होने वाले अत्याचारों को गंभीरता से देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए अनेक प्रयासों के बावजूद यह वर्ग आज भी विभिन्न प्रकार के भेदभाव, उत्पीड़न और अपराधों का सामना कर रहा है।

न्यायालय ने भी इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदाय के लोगों को ऐतिहासिक रूप से अनेक कठिनाइयों और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा है। ऐसे अपराध न केवल पीड़ित व्यक्ति बल्कि पूरे समुदाय की गरिमा और सम्मान को ठेस पहुंचाते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में कठोर दंड आवश्यक है, जिससे समाज में कानून के प्रति विश्वास बना रहे और अपराधियों को कड़ा संदेश मिले।

यह फैसला अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के विरुद्ध होने वाले अपराधों के मामलों में न्यायालय की संवेदनशीलता और कठोर रुख को दर्शाता है तथा समाज में समानता, सम्मान और न्याय की भावना को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

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