लाखों खर्च के बावजूद मजदूर दिवस का कवि सम्मेलन फ्लॉप, खाली कुर्सियों के बीच गूंजा श्रमिकों का गुस्सा “हमारे पैसे की बंदरबांट बंद हो, ऐसे आयोजन हों बंद” लाखों खर्च के बावजूद खाली रही कुर्सियां

 

चरचा कॉलरी। मजदूर दिवस के अवसर पर एसईसीएल बैकुंठपुर क्षेत्र अंतर्गत चरचा माइन आरओ स्थित श्रमवीर स्टेडियम में आयोजित कवि सम्मेलन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका। लाखों रुपये खर्च कर आयोजित इस कार्यक्रम में दर्शकों की भारी कमी देखने को मिली, जिससे आयोजन की सार्थकता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

कार्यक्रम का आयोजन क्षेत्र के पांच श्रम संघ प्रतिनिधियों के नेतृत्व में किया गया था, लेकिन विडंबना यह रही कि जिन श्रमिकों के नाम पर यह आयोजन किया गया, वही इसमें नजर नहीं आए। स्टेडियम में सैकड़ों कुर्सियां खाली पड़ी रहीं, जो आयोजन की वास्तविक स्थिति को बयां कर रही थीं।
इस दौरान कई श्रमिकों ने नाराजगी जाहिर करते हुए आरोप लगाया कि उनके एक दिन के वेतन से कटौती कर इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, लेकिन उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता। श्रमिकों का कहना है कि फुटबॉल, वॉलीबॉल, दुर्गा पूजा और कवि सम्मेलन जैसे आयोजनों के लिए जबरन धन लिया जाता है, जबकि यूनियन सिर्फ सदस्यता शुल्क तक ही सीमित रहती है।

श्रमिकों ने यह भी आरोप लगाया कि आयोजन के नाम पर धन का दुरुपयोग किया जा रहा है। बाहर से नामी कवियों को बुलाने की बात कही जाती है, लेकिन वास्तव में स्थानीय स्तर पर ही कार्यक्रम कर औपचारिकता पूरी कर ली जाती है। इससे न तो सांस्कृतिक उद्देश्य पूरे हो पाते हैं और न ही श्रमिकों का जुड़ाव बन पाता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एसईसीएल प्रबंधन और श्रमिक संगठनों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मजदूर दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में श्रमिकों की अनुपस्थिति यह संकेत देती है कि श्रमिकों और प्रबंधन के बीच संवाद और विश्वास की कमी बढ़ती जा रही है।

अब देखना होगा कि संबंधित जिम्मेदार इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से लेते हैं और भविष्य में ऐसे आयोजनों को श्रमिकों की भागीदारी के अनुरूप बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

मजदूर दिवस के अवसर पर एसईसीएल बैकुंठपुर क्षेत्र के चरचा माइन आरओ स्थित श्रमवीर स्टेडियम में आयोजित कवि सम्मेलन अब विवादों के घेरे में आ गया है। लाखों रुपये खर्च कर आयोजित इस कार्यक्रम में जहां एक ओर श्रमिकों की उपस्थिति नगण्य रही, वहीं अब कार्यक्रम के संचालन और कवरेज को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं।

सूत्रों और स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, कार्यक्रम में अधिकारी एवं यूनियन नेताओं द्वारा केवल चुनिंदा पत्रकारों को ही आमंत्रित किया गया। चरचा क्षेत्र के कई पत्रकारों को नजरअंदाज किया गया, जिससे नाराजगी का माहौल बन गया है। आरोप है कि यह कदम जानबूझकर उठाया गया ताकि कार्यक्रम में श्रमिकों की कम उपस्थिति की सच्चाई सामने न आ सके और आयोजन पर हुए खर्च व व्यवस्थाओं को लेकर सवाल न उठें।

स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि इस तरह का भेदभाव न केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि पारदर्शिता की कमी को भी उजागर करता है। उनका आरोप है कि यदि सभी मीडिया प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाता, तो आयोजन की वास्तविक तस्वीर सामने आती।

वहीं श्रमिकों के बीच पहले से ही नाराजगी बनी हुई है। उनका कहना है कि उनके वेतन से कटौती कर इस तरह के आयोजनों पर खर्च किया जाता है, लेकिन उनकी मूलभूत समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता। अब चयनात्मक मीडिया आमंत्रण के आरोपों ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है।

पूरा मामला अब एसईसीएल प्रबंधन, श्रम संघों और स्थानीय मीडिया के बीच विश्वास के संकट के रूप में उभर रहा है। मजदूर दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर इस तरह के विवाद यह संकेत दे रहे हैं कि श्रमिकों, प्रबंधन और समाज के बीच संवाद की खाई लगातार बढ़ती जा रही है।

आवश्यकता इस बात की है कि भविष्य में ऐसे आयोजनों में पारदर्शिता, सहभागिता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जाए, ताकि मजदूर दिवस का वास्तविक उद्देश्य श्रमिकों का सम्मान और उनकी आवाज को मंच देना सार्थक रूप में पूरा हो सके।

मजदूर दिवस के अवसर पर एसईसीएल बैकुंठपुर क्षेत्र अंतर्गत चरचा माइन आरओ के श्रमवीर स्टेडियम में आयोजित कवि सम्मेलन पूरी तरह असफल साबित हुआ। लाखों रुपये खर्च कर किए गए इस आयोजन में न तो अपेक्षित भीड़ जुट पाई और न ही श्रमिकों की भागीदारी नजर आई, जिससे पूरे कार्यक्रम की उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

कार्यक्रम स्थल पर सैकड़ों कुर्सियां खाली पड़ी रहीं, जो इस बात का स्पष्ट संकेत था कि श्रमिकों और स्थानीय लोगों में इस आयोजन को लेकर कोई खास उत्साह नहीं था। जिन श्रमिकों के नाम पर यह कार्यक्रम आयोजित किया गया, वही इससे दूरी बनाए रहे।

इस बीच श्रमिकों में नाराजगी खुलकर सामने आई है। कई श्रमिकों ने आरोप लगाया कि उनके वेतन से कटौती कर इस तरह के आयोजन किए जाते हैं, लेकिन बदले में उन्हें कोई लाभ या सम्मान नहीं मिलता। उनका कहना है कि यह आयोजन केवल औपचारिकता बनकर रह गया है, जिसमें उनकी भागीदारी या राय का कोई महत्व नहीं है।

श्रमिकों ने यहां तक कहा कि इस प्रकार के आयोजनों के नाम पर केवल पैसे का दुरुपयोग हो रहा है। “हमारे पैसे की बंदरबांट की जाती है और हमें ही नजरअंदाज किया जाता है,” यह बात कई श्रमिकों की नाराजगी को साफ तौर पर दर्शाती है।

कुछ श्रमिकों ने तो ऐसे आयोजनों को पूरी तरह बंद करने की मांग भी उठाई है। उनका कहना है कि जब तक श्रमिकों की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जाता और उनकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक इस तरह के कार्यक्रमों का कोई औचित्य नहीं है।

मजदूर दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर इस तरह की विफलता ने न केवल आयोजन की मंशा पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दर्शाया है कि श्रमिकों और प्रबंधन के बीच संवाद की कमी गहराती जा रही है। अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी और श्रम संगठन इस नाराजगी को किस तरह संबोधित करते हैं और भविष्य में ऐसे आयोजनों को श्रमिकों के हित में किस प्रकार बेहतर बनाते हैं।

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