जिला कोरिया। जिला मुख्यालय सहित आसपास के क्षेत्रों में इन दिनों राजश्री गुटखा की कीमतों को लेकर उपभोक्ताओं में भारी नाराज़गी देखी जा रही है। बाजार में जिस पूड़े पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) 120 रुपये अंकित है, वही पूड़ा 160 से 170 रुपये तक में बेचा जा रहा है। आरोप है कि बड़े थोक व्यापारी मनमाने ढंग से दाम बढ़ाकर ग्राहकों और छोटे दुकानदारों से वसूली कर रहे हैं।
स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि केवल राजश्री गुटखा और गुड़ाखू के दामों में ही अचानक बढ़ोतरी की गई है, जबकि अन्य गुटखे पुराने रेट पर ही बिक रहे हैं। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि कुछ बड़े व्यापारी कृत्रिम कमी दिखाकर कालाबाजारी कर रहे हैं।
ग्राहकों का आरोप है कि खुलेआम एमआरपी से अधिक दाम वसूले जा रहे हैं, लेकिन संबंधित विभाग और प्रशासन इस पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर रहा है। बाजार में जिस तरह से कालाबाजारी हो रही है, वह चिंताजनक स्थिति है।
जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि प्रशासन तत्काल संज्ञान लेते हुए बाजार की जांच कराए, स्टॉक और बिलों की जांच की जाए तथा दोषी थोक व्यापारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए। साथ ही उपभोक्ताओं से एमआरपी से अधिक कीमत न वसूलने के निर्देश सख्ती से लागू किए जाएं।
यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई तो उपभोक्ताओं में आक्रोश बढ़ सकता है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में कब तक कदम उठाता है और बाजार में चल रही कथित कालाबाजारी पर लगाम लगती है या नहीं।
सूत्रों के अनुसार कुछ व्यापारियों द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि कंपनी स्तर पर आपूर्ति में कमी और परिवहन लागत बढ़ने के कारण दाम बढ़े हैं, किंतु यदि ऐसा है तो पैकेट पर अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) में परिवर्तन क्यों नहीं किया गया, यह बड़ा सवाल बना हुआ है। एमआरपी से अधिक कीमत वसूलना उपभोक्ता संरक्षण नियमों का उल्लंघन माना जाता है।
उपभोक्ताओं का कहना है कि यदि थोक व्यापारी ही ऊंचे दाम पर माल दे रहे हैं तो छोटे दुकानदार भी मजबूरी में अधिक कीमत वसूलने को विवश हो रहे हैं। इस स्थिति में सबसे अधिक नुकसान आम उपभोक्ता को उठाना पड़ रहा है। कई ग्राहकों ने यह भी बताया कि मांग अधिक होने का हवाला देकर कृत्रिम कमी का माहौल बनाया जा रहा है।
स्थानीय नागरिकों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि खाद्य एवं औषधि विभाग, वाणिज्यिक कर विभाग तथा पुलिस की संयुक्त टीम बनाकर गोदामों और थोक प्रतिष्ठानों में छापामार कार्रवाई की जाए। स्टॉक रजिस्टर, बिलिंग रिकॉर्ड और वितरण प्रणाली की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाए।
जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते सख्ती नहीं बरती गई तो यह प्रवृत्ति अन्य उत्पादों में भी देखने को मिल सकती है। फिलहाल आम जनता प्रशासनिक हस्तक्षेप की प्रतीक्षा कर रही है, ताकि बाजार में पारदर्शिता बनी रहे और उपभोक्ताओं को एमआरपी पर ही सामान उपलब्ध हो सके।
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